बाहिरसंगा खेत्तं वत्थुं धणधण्णकुप्पभंडाणि ।
दुपयचउप्पय जाणाणि चेव सयणासणे य तहा॥1126॥
क्षेत्र मकान तथा धन धान्य वस्त्र भांड अरु दुपद कहे ।
चौपद यान शयन-आसन ये दस बहिरंग परिग्रह हैं॥1126॥
अन्वयार्थ :
  1. धान्य उत्पन्न होने का [[क्षेत्र]]
  2. रहने योग्य जगह तथा अन्य मकान, उन्हें [[वास्तु]] कहते हैं
  3. सोना, चाँदी, रुपया, मुहर (मुद्रा) इत्यादि को [[धन]] कहते हैं
  4. चावल, गेहूँ, जौ इत्यादि [[धान्य]] होते हैं
  5. वस्त्रादि [[कुप्य]] हैं
  6. कुंकुम, कर्पूर, मिर्च, हिंग्वादिक [[भांड]] हैं
  7. दासी, दास तथा अन्य सेवकादि का समूह [[द्विपद]] है
  8. हस्ती, घोडा, बैल इत्यादि [[चतुष्पद]] हैं
  9. पालकी, विमान इत्यादि [[यान]] हैं
  10. शय्या-पर्यंकादि और सिंहासनादि [[आसन]] हैं
ये दस प्रकार के बाह्य ग्रन्थ हैं । बाह्य परिग्रह के परित्याग बिना आत्मा के दर्शन, ज्ञान, चारित्र, वीर्य, अव्याबाधसुख इत्यादि गुणों के घात करने वाले मोहमल का अभाव नहीं होता ।

  सदासुखदासजी