
जह कुण्डओ ण सक्को सोधेदुं तंदुलस्स सतुसस्स ।
तह जीवस्स ण सक्का मोहमलं संगसत्तस्स॥1127॥
यथा धान्य का छिलका दूर किये बिन अन्तर मल-शोधन ।
शक्य नहीं त्यों बाह्य संग युत कर न सके मोह-मल क्षय॥1127॥
अन्वयार्थ : जैसे तुषसहित तन्दुल का कुण्ड/अन्तरमल को दूर करने में समर्थ नहीं होते, तैसे ही बाह्य परिग्रह में आसक्त जीव स्वयं के अभ्यंतर/भीतर का जो मोहमल, उसे दूर करने में समर्थ नहीं होता ।
सदासुखदासजी