रागो लोभो मोहो सण्णाओ गारवाणि य उदिण्णा ।
तो तइया घेत्तुं जे गंथे बुद्धि णरो कुणइ॥1128॥
राग मोह अरु मोह तथा संज्ञा गौरव के हों परिणाम ।
तो ही बाह्य परिग्रह का संग करने के होते परिणाम॥1128॥
अन्वयार्थ : परद्रव्य में आसक्ति, वह राग है । परिग्रह की इच्छा, वह लोभ है । परवस्तु में अपनापन, वह मोह है । मुझे यह वस्तु सुखकारी है, ऐसी इच्छारूप परिणाम, वह संज्ञा है । पर्याय संबंधी बडप्पन का अभिमान करना, वह गारव है । जिस समय राग, लोभ, मोह, संज्ञा, गारव - ये उत्कृष्टता को प्राप्त होते हैं, उस समय यह मनुष्य परिग्रह ग्रहण करने की बुद्धि करता है ।

  सदासुखदासजी