ण य होदि संजदो वत्थमित्तचागेण सेससंगेहिं ।
तह्मा आचेलक्कं चाओ सव्वेसि होइ संगाणं॥1131॥
अन्य परिग्रह रखकर करता केवल वस्त्रों का परित्याग ।
नहीं संयमी अतः अचेलक में हैं सर्व परिग्रह त्याग॥1131॥
अन्वयार्थ : क्योंकि वस्त्रमात्र ही के त्याग कर देने से और अन्य परिग्रह के धारण करने से संयमी नहीं होता है, इसलिए आचेलक्य(आचेलक्य शब्द की निरुक्ति - "न चेलम् इति चेलग्रहणं परिग्रहोपलक्षणं तेन सकल-धन-धान्यादि-परिग्रह-त्याग: गृह्यते") वस्त्र का जो त्याग कहा, वह सर्वपरिग्रह का ही त्याग कहा है ।

  सदासुखदासजी