संगणिमित्तं मारेइ अलियवयणं च भणइ तेणिक्कं ।
भजदि अपरिमिदमिच्छं सेवदि मेहुणमवि य जीवो॥1132॥
परिग्रह हेतु करे हिंसा अरु झूठ कहे, परधन हरता ।
इच्छायें भी करे असीमित मैथुन सेवन भी करता॥1132॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के लंपटी के पाँचों पापों में प्रवृत्ति होती ही है ।

  सदासुखदासजी