सण्णागारवपेसुण्णकलहफरुसाणि णिट्ठरविवादा ।
संगणिमित्तं ईसासूयासल्लाणि जायंति॥1133॥
संज्ञा गारव पर-निन्दा कर्कशता कलह विवाद करे ।
निष्ठुरता ईर्ष्या असहिष्णु शल्य आदि सब दोष रहें॥1133॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के लिये ईर्ष्या करता है तथा असूया/अदेखसका भाव करता है । यह पुरुष इसको देता है, मुझे नहीं देता है तथा इस कार्य में इसके तो अच्छा हुआ और मेरे नहीं हुआ, इसका नाम ईर्ष्या है । तथा अन्य धनवानों को नहीं देख सकना, इसका नाम असूया है । इतने सभी दोष परिग्रह में आसक्त पुरुष के जानना ।

  सदासुखदासजी