कोधो माणो माया लोभो हास रइ अरदि भयसोगा ।
संगणिमित्तं जायइ दुगुंच्छ तह रादिभत्तं च॥1134॥
क्रोध मान माया अरु तृष्णा हास्य अरति रति भय अरु शोक ।
रात्रि भोजन और जुगुप्सा आदि दोष हों परिग्रह से॥1134॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के धारी को जहाँ परिग्रह नहीं दिखे - ऐसे दरिद्री पुरुषों में तथा दरिद्रियों के गृह, कुटुम्ब में महाग्लानि करता है तथा परिग्रह का धारक रात्रिभोजनादि सकल पापों को अंगीकार कर लेता है । परिग्रह का लोलुपी खाद्य-अखाद्य, योग्य-अयोग्य किसी का विचार नहीं करता है ।

  सदासुखदासजी