
आउधवासस्स उरं देइ रणमुहम्मि गंथलोभादो ।
मगरादिभीमसावदबहुलं अदिगच्छदि समुद्दं॥1143॥
सहे बाण-वर्षा सीने पर युद्ध भूमि में लोभवशात् ।
मच्छादिक भयकारी जलचर भरे उदधि में करे निवास॥1143॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के लोभ से संग्राम में आयुधों की वर्षा के सामने अपना हृदय खोल देता है और परिग्रह की वांछा से मगर-मत्स्यादि से भयानक और अनेक दुष्ट जीव हैं जिसमें, ऐसे समुद्र में भी प्रवेश करता है ।
सदासुखदासजी