जदि सो तत्थ मरिज्जो गंथो भोगा य कस्स ते होज्ज ।
महिलाविहिंसणिज्जो लूसिददेहो व सो होज्ज॥1144॥
यदि वह मरे कदाचित् रण में तो परिग्रह को भोगे कौन?
हाथ पैर भी कट जायें तो नारी भी न करे सम्मान॥1144॥
अन्वयार्थ : धन का लोभी कदाचित् रण में मर जाये, समुद्र में मर जाये, तो परिग्रह का भोग कौन करेगा? रण में जाने से तथा समुद्र में प्रवेश करने से शरीर लूखा हो जाये, विरूप हो जाये तो स्त्रियों के ग्लानि करने योग्य हो जाता है, तब धन/परिग्रह में क्या सुख हुआ?

  सदासुखदासजी