सूरो तिक्खो मुक्खो वि होइ वसिओ जणस्स सघणस्स ।
माणी वि सहइ गंथणिमित्तं बहुयं पि अवमाणं॥1146॥
शूर उग्र या प्रमुख पुरुष भी धनी पुरुष के दास बनें ।
अभिमानी नर भी परिग्रह के लिए बहुत अपमान सहे॥1146॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के निमित्त महान अपमान सह लेता है ।

  सदासुखदासजी