एवं चेट्ठंतस्स वि संसइदो चेव गंथलाहो दु ।
ण य संचीयदि गंथो सुइरेणवि मंदभागस्स॥1148॥
कोशिश बहुत करे तो भी परिग्रह मिलने में है सन्देह ।
करे यत्न चिरकाल किन्तु नर पुण्यहीन धन नहिं पाए॥1148॥
अन्वयार्थ : इस तरह अनेक प्रकार के उद्यम, अनेक प्रकार की नीच प्रवृत्ति करने वाले पुरुष को परिग्रह का लाभ होना शंकाशील है - लाभ हो भी, न भी हो । नीच प्रवृत्ति करने से लाभ हो ही जायेगा - ऐसा नियम नहीं है; क्योंकि मन्दभाग/भाग्यहीन पुरुष को बहुत समय तक महा उद्यम करने पर भी परिग्रह का संचय तथा लाभ नहीं होता है ।

  सदासुखदासजी