
जदि वि कहंचि वि गंथा संचीएजण्ह तह वि से णत्थि ।
तित्ती गंथेहिं सदा लोभो लाभेण वड्ढदि खु॥1149॥
यदि कैसे भी धन मिल जाये तो भी नहिं होता सन्तोष ।
लोभी को कितना भी मिलता तो भी बढ़ता जाता लोभ॥1149॥
अन्वयार्थ : यदि कदाचित् परिग्रह का संचय भी हो जाये तो भी उसको परिग्रह से तृप्ति नहीं होती, क्योंकि लाभ होने पर भी लोभ वृद्धि को प्राप्त हो जाता है । जैसे-जैसे धन का लाभ होता जाता है, तैसे-तैसे लोभ भी वृद्धि को प्राप्त होता जाता है ।
सदासुखदासजी