जध इंधणेहिं अग्गी लवणसमुद्दो णदीसहस्सेहिं ।
तह जीवस्स ण तित्ती अत्थि तिलोगे वि लद्धम्मि॥1150॥
अग्नि तृप्त नहिं हो ईंधन से लवणोदधि नहिं नदियों से ।
त्यों त्रिलोक निधि मिलने पर भी जीव तृप्त नहिं परिग्रह से॥1150॥
अन्वयार्थ : जैसे ईन्धन से अग्नि तृप्त नहीं होती और हजारों नदियों से समुद्र तृप्त नहीं होता; तैसे ही त्रैलोक्य का लाभ हो जाये तो भी संसारी जीव को तृप्ति नहीं होती ।

  सदासुखदासजी