पडहत्थस्स ण तित्ती आसी य महाधणस्स लुद्धस्स ।
संगेसु मुच्छिदमदी जादो सो दीहसंसारी॥1151॥
डिहत्थस्स ण ेतत्ती आसी य महाधणस्स लुद्धस्स ।
संगसिु मुच्छिदमदी जादाि साि दीहसंसारी॥1151॥
अन्वयार्थ : महाधन के धनी और महालोभी पटहस्त नामक वणिक को बहुत धन से भी तृप्ति नहीं हुई, परिग्रह में अति ममतारूप बुद्धि के कारण अनंत संसारी हुआ । इसलिए परिग्रह समान तृष्णा बढाने वाला और कोई नहीं है ।

  सदासुखदासजी