तित्तीए असंतीए हाहाभूदस्स घण्णचित्तस्स ।
किं तत्थ होज्ज सुक्खं सदा वि पंपाए गहिदस्स॥1152॥
हाय हाय करता धन हेतु तृप्त नहीं धन का लोभी ।
व्याकुल सदा रहे तृष्णा से वह कैसे हो सके सुखी॥1152॥
अन्वयार्थ : परिग्रह से तृप्ति नहीं हो, तब हाय-हाय करता है और लंपटी है चित्त जिसका तथा हमेशा तृष्णा से ग्रहण किया/पकडा गया है - ऐसे लोभी को परिग्रह में सुख होता है क्या? नहीं, सुख होता ही नहीं ।

  सदासुखदासजी