हम्मदि मारिज्जदि वा बज्झदि रुंभदि य अणवराधे वि ।
आमिसहेदुं घण्णो खज्जदि पक्खीहिं जह पक्खी॥1153॥
बिना किसी अपराध दूसरों से पकड़ा मारा जाता ।
मांस हेतु ज्यों सामिस पक्षी अन्यों से मारा जाता॥1153॥
अन्वयार्थ : जैसे मांस के लिये लंपटी हुआ पक्षी अन्य पक्षी को मांस ले जाते हुए देखकर मारता है, खा जाता है । तैसे ही अपराधरहित धनाढ्य पुरुष को भी धन के लिए दुष्ट राजा, हिस्सेदार, भाई, चोर, दुष्ट कोतवाल, अपने दुष्ट कुटुम्बी बिना कारण ही मारते हैं, हनन करते हैं, बाँधते हैं, रोकते हैं । ऐसा विचार नहीं करते कि बिना अपराध के इसको कैसे मारता हूँ? धन छीन लेने में, लूट लेने का जिनका परिणाम है, उन निर्दयी जनों को काहे की दया? इसलिए परिग्रह के लिये हनना, मारना, बाँधना, रोकना - सभी दु:ख सहन करने पडते हैं ।

  सदासुखदासजी