सव्वं पि संकमाणो गामेणयरे घरे व रण्णे वा ।
आधारमग्गणपरो अणप्पवसिओ सदा होइ॥1155॥
सबके ऊपर शंका करता गाँव नगर घर या वन में ।
आश्रय खोजा करे किसी का पराधीन है जीवन में॥1155॥
अन्वयार्थ : परिग्रहधारी पुरुष सर्व लोकों से शंकित रहने के कारण ग्राम में, नगर में, गृह में तथा वन में आधार ढूँढने में सदा अनात्मवश तत्पर होता है ।

  सदासुखदासजी