गंथपडियाए लुद्धो धीराचरियं विचित्तमावसधं ।
णेच्छदि बहुजणमज्झे वसदि य सागारिगावसए॥1156॥
धीरों के रहने लायक एकान्त वास को नहिं चाहे ।
परिग्रह लोभी बहुजन मध्य गृहस्थों के घर सदा बसे॥1156॥
अन्वयार्थ : जो परिग्रह का लोभी है, वह धीर पुरुषों द्वारा किया गया आचरण, ऐसे एकान्त स्थान को नहीं इच्छता है, बहुत जनों के बीच गृहस्थों के गृहों में बसता है ।

  सदासुखदासजी