पं-सदासुखदासजी
सोदूण किंचिसद्दं सग्गंथो होइ उट्ठिदो सहसा ।
सव्वत्तो पिच्छंतो परिमसदि पलादि मुज्झदि य॥1157॥
किंचित् भी यदि शब्द सुने तो उठकर देखे चारों ओर ।
सदा टटोले अपने धन को भागे अथवा मूर्च्छित हो॥1157॥
सदासुखदासजी