तेणभएणारोहइ तरुं गिरिं उप्पहेण व पलादि ।
पविसदि य दहं दुग्गं जीवाण वहं करेमाणो॥1158॥
चोरों के डर से तरु-गिरि पर चढ़े और जाये उन्मार्ग ।
छिपे किले में या तलाब में करता है जीवों का घात॥1158॥

  सदासुखदासजी