
तह वि य चोरा चारभडा वा गच्छं हरेज्ज अवसस्स ।
गेण्हिज्ज दाइया वा रायाणो वा विलुंपिज्ज॥1159॥
इतने पर भी चोर तथा बलवान करें उसको पर-वश ।
धन लूटें या बन्धु आदि लें या राजा भी धन ले सब॥1159॥
अन्वयार्थ : परिग्रहसहित पुरुष जरा-सा भी शब्द सुनता है तो शीघ्र ही उठकर सर्व ओर देखने लगता है और अपने द्रव्य/धन को हाथ लगाकर देखता है तथा लेकर भाग जाता है और अज्ञानता के कारण मोह से बेखबर हो जाता है । चोर के भय से वृक्ष पर चढ जाता है, पर्वत पर चढ जाता है और चोर-लुटेरों के भय से उत्पथ मार्ग/गुप्त या ऊबड-खाबड मार्ग से भागता है, जल के द्रह - सरोवर में पड जाता है, महा विषम स्थान में चला जाता है । कोई अपने को भागता हुआ देखकर रोके तो उन जीवों को मारकर भाग जाता है । ऐसा भयवान होकर दौडता है तो भी चोर तथा प्रबल योद्धा उसको वशीभूत करके, पकडकर धन हर लेते हैं अथवा हिस्सेदार जो भाई-बन्धु, वे धन हर लेते हैं तथा राजा लूट लेता है, तब उसके दु:ख को कहने में कौन समर्थ है?
सदासुखदासजी