अहवा होइ विणासो गंथस्स जलग्गिमूसयादीहिं ।
णट्ठे गंथे य पुणो तिव्वं पुरिसो लहदि दुक्खं॥1161॥
अथवा अग्नि और नीर मूषक आदिक से परिग्रह नाश ।
तीव्र दुखी होता यह मानव परिग्रह का जब होय विनाश॥1161॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के लिये क्रोधी हो जाता है, कलह करता है, विवाद करता है, बैर करता है, हनता है, ताडना देता है, मारता है, पर के द्वारा मारा जाता है अथवा जल से, अग्नि से, मूषादिक के द्वारा परिग्रह नष्ट हो जाये, तब वह पुरुष महा दु:ख को प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी