सोयइ विलबइ कंदइ णट्ठे गंथम्मि होइ विसण्णो ।
पज्झादि णिवाइज्जइ वेवइ उक्कंठिओ होइ॥1162॥
चिल्लाता विलाप करता अरु खेद-खिन्न हो शोक करे ।
चिन्ता अरु सन्ताप करे वह काँपे उत्कण्ठित होवे॥1162॥
अन्वयार्थ : परिग्रह नष्ट होने पर शोक करता है, विलाप करता है, पुकार करता है, विषादी होता है, चिन्ता करता है, सन्ताप को प्राप्त होता है, कंपायमान होता है तथा उत्कंठित हो जाता है ।

  सदासुखदासजी