
डज्झदि अंतो पुरिसो अप्पिए णट्ठे सगम्मि गंंथम्मि ।
वायावि य अक्खिप्पइ बुद्धी विय होइ से मूढा॥1163॥
यदि अपना धन हो विनष्ट तो अन्तर में नर जला करे ।
वाणी भी हो नष्ट और बुद्धि भी उसकी भ्रष्ट बने॥1163॥
अन्वयार्थ : अपने थोडे-से भी परिग्रह का नाश होने पर अन्त:करण में दाह/जलन होने लगती है, वचन भी नष्ट हो जाते हैं और उसकी बुद्धि भी मूढ हो जाती है ।
सदासुखदासजी