
उम्मत्तो होइ णरो णट्ठे गंथे गहोवसिट्ठो वा ।
घट्टदि मरुप्पवादादिएहिं बहुधा णरो मरिदंु॥1164॥
परिग्रह के विनष्ट होने पर ग्रस्त-पिशाच मनुज की भाँति ।
हो उन्मत्त तथा पर्वत से गिरकर यह मरना चाहे॥1164॥
अन्वयार्थ : जैसे पिशाच से ग्रस्त पुरुष उन्मत्त हो जाता है, अपने को भूल जाता है, तैसे ही परिग्रह का नाश हो जाये तो पुरुष उन्मत्त हो जाता है तथा पर्वतादि से गिरकर अनेक प्रकार से मरने की चेष्टा करता है ।
सदासुखदासजी