चेलादीया संगा संसज्जंति विविहेहिं जंतूहिं ।
आगंतुगा वि जंतू हवंति गंथेसु सण्णिहिदा॥1165॥
वस्त्रादिक परिग्रह में होते हैं अनेक सम्मूर्छन जीव ।
जूँ चींटी खटमल आदिक भी धान्य गुड़ादिक में हों जीव॥1165॥
अन्वयार्थ : वस्त्रादि परिग्रह में ऊपर के तथा भूमि पर विचरने वाले कीडा-कीडी-मच्छर-डांस-मकडीक नखजूरा इत्यादि अनेक आगन्तुक जीव हो जाते हैं ।

  सदासुखदासजी