
जदि वि विकिंचदि जंतू दोसा ते चेव हुंति से लग्गा ।
होदि य विकिंचणे वि हु तज्जोणिविओजणाणिययं॥1168॥
यदि वस्त्रादिक से जीवों को अलग करें तो भी वे दोष ।
लगें, क्योंकि जन्म स्थल छूटे जिससे उनकी मृत्यु हो॥1168॥
अन्वयार्थ : वस्त्रादि परिग्रह ग्रहण करने में, रखने में, पसारने में, उत्कर्षण/बढाने में, इधर- उधर खींचने में, बाँधने में, छोडने में, हिलाने में, छेदने में, ओढने में, धूप में सुखाने में, धोने आदि क्रियाओं में जीवों का संघटन/एक-दूसरे से टकराने में, परितापन, हनन/मारण आदि प्रगट ही होते दिखते हैं । यद्यपि वस्त्रादि से जीव निकालने में भी वही दोष लगते हैं; क्योंकि उन जीवों को दूर करने में भी उन जीवों का योनिस्थान छूट जाने से मरण हो जाता है । इसलिए परिग्रही निश्चय से जीवों की विराधना ही करता है ।
सदासुखदासजी