
सच्चित्ता पुण गंथा वधंति जीवे सयं च दुक्खंति ।
पावं च तण्णिमित्तं परिगिण्हंतस्स से होई॥1169॥
सचित परिग्रह भी जीवों का घात करें अरु होय दुखी ।
वे जो पापाचरण करें उसका भागी हो स्वामी भी॥1169॥
अन्वयार्थ : दासी-दास-गाय-भैंसादि सचित्त परिग्रह हैं । उन जीवों को मारता है, घात करता है तथा स्वयं भी दु:ख को प्राप्त होता है, खेती इत्यादि आरम्भ में युक्त होकर महापाप करता है, इसलिए सचित्त परिग्रह ग्रहण करने पर उनके निमित्त से पाप ही होता है ।
सदासुखदासजी