
इंदियमयं सरीरं गंथं गेण्हदि य देहसुक्खत्थं ।
इंदियसुहाभिलासो गंथग्गहणेण तो सिद्धो॥1170॥
यह शरीर इन्द्रियमय है तो देह सुखार्थ गहे परिग्रह ।
अतः सिद्ध है, ग्रन्थ ग्रहण है इन्द्रिय सुख अभिलाषा से॥1170॥
अन्वयार्थ : यह शरीर इन्द्रियमय है, इन्द्रियों से भिन्न शरीर नहीं है और ग्रन्थ/परिग्रह ग्रहण करता है, वह शारीरिक सुख के लिये ही करता है । इसलिए परिग्रह ग्रहण करने में इन्द्रियसुख की अभिलाषा सिद्ध हुईऔर इन्द्रियजनित सुख की अभिलाषा कर्मबंध का निमित्त है, इसलिए मोक्षाभिलाषी को परिग्रह का त्याग करना ही उचित है ।
सदासुखदासजी