गंथस्स गहणरक्खणसारवणाणि णियदं करेमाणो ।
विक्खित्तमणो ज्झाणं उवेदि कह मुक्कसज्झाओ॥1171॥
परिग्रह ग्रहण और रक्षण सम्हाल करने में व्याकुल मन ।
स्वाध्याय भी कर न सके तो कैसे कर सकता शुभ ध्यान॥1171॥
अन्वयार्थ : त्याग दिया है स्वाध्याय जिसने - ऐसा स्वाध्यायरहित होकर परिग्रह की रक्षा तथा परिग्रह के ग्रहण, परिग्रह का सँभालना, इस तरह सदा ही परिग्रह में लीनता के कारण विक्षिप्त है मन जिसका वह, कैसे शुभ ध्यान करे?

  सदासुखदासजी