
गंथेसु घडिदहिदओ होइ दरिद्दो भवेसु बहुगेसु ।
होदि कुणंतो णिच्चं कम्मं आहारहेदुम्मि॥1172॥
परिग्रह का परित्याग करें तो ये सब दोष नहीं होते ।
पर इनके विपरीत बहुत गुण हों परिग्रह को तजने से॥1172॥
अन्वयार्थ : जिसका चित्त परिग्रह में आसक्त है, वह बहुत भवों पर्यंत दरिद्री होता हुआ आहार के लिये अनेक नीच कर्म करता हुआ भ्रमण करता है ।
सदासुखदासजी