
विविहाओ जायणाओ पावदि परभवगदो वि धणहेदुं ।
लुद्धो पंपागहिदो हाहाभूदो किलिस्सदि य॥1173॥
परिग्रह में आसक्त पुरुष धन हेतु सहे पर-भव में कष्ट ।
लुब्ध हुआ तृष्णा से व्याकुल हा!हा! करे सहे अतिकष्ट॥1173॥
अन्वयार्थ : परिग्रह में आसक्त पुरुष परभव में धन के निमित्त अनेक प्रकार के दु:खों को पाता है और लोभी होकर आशा के आधीन हाय-हाय करता हुआ क्लेश को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी