गंथच्चाओ इंदियणिवारणे अंकुसो व हत्थिस्स ।
णयरस्स खाइया वि य इंदियगुत्तो असंगत्तं॥1175॥
ज्यों हाथी को अंकुश है, इन्द्रिय निरोध को परिग्रह त्याग ।
खाई से ज्यों नगर सुरक्षित इन्द्रिय गुप्त रखे परित्याग॥1175॥
अन्वयार्थ : जैसे हाथी को उच्छृंखल मार्ग से रोकने के लिये अंकुश है, तैसे ही इन्द्रियों के विषयों को रोकने में परिग्रहत्याग नामक व्रत समर्थ है । जैसे नगर की रक्षा के लिये खाई होती है, तैसे ही इन्द्रियों को रागभाव से तथा कामभाव से रोकने में एक परिग्रह रहितपना ही समर्थ है ।

  सदासुखदासजी