
सप्पबहुलम्मि रण्णे अमंतविज्जोसहो जहा पुरिसो ।
होइ दढमप्पमत्तो तह णिग्गंथो वि विसएसु॥1176॥
मन्त्र-औषधि-विद्या रहित पुरुष ज्यों सर्प बहुल वन में ।
सावधान रहता है वैसे साधु रहें विषय-वन में॥1176॥
अन्वयार्थ : जैसे बहुत से सर्प हैं जिसमें, ऐसे वन में मंत्ररहित, विद्यारहित, औषधिरहित पुरुष वह अत्यन्त अप्रमादी-सावधान होकर बसता है; तैसे ही क्षायिक सम्यक्त्व, केवलज्ञान, यथाख्यातचारित्ररूप जो मंत्र विद्या - औषधि रहित निर्ग्रन्थ भी रागादि सर्प से व्याप्त विषयरूपी वन में प्रमादी होकर नहीं बसते हैं, सावधान ही रहते हैं ।
सदासुखदासजी