रागो हवे मणुण्णे विसए दोसो य होइ अमणुण्णे ।
गंथच्चाएण पुणो रागद्दोसा हवे चत्ता॥1177॥
होता राग मनोज्ञ विषय में तद्विपरीत विषय में द्वेष ।
अतः परिग्रह तजने से होते विनष्ट ये राग-रु द्वेष॥1177॥
अन्वयार्थ : मनोज्ञ विषय में राग होता है, अमनोज्ञ में द्वेष होता है और मनोज्ञ-अमनोज्ञ दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग करने से राग-द्वेष का त्याग होता है ।

  सदासुखदासजी