
सीदुण्हदंसमसयादियाण दिण्णो परीसहाण उरो ।
सीदादिणिवारणए गंथे णिययं जहंतेण॥1178॥
जो शीतादि निवारक वस्त्रादिक का करे नियम से त्याग ।
वह शीतादि परिषह सहने अपना सीना तान खड़ा॥1178॥
अन्वयार्थ : शीत-उष्णादि वेदना का निवारण करनेवाले तथा वस्त्रादि परिग्रह का त्याग करनेवाले पुरुष ने शीत, उष्ण, दंशमशकादि की वेदनारूप परीषह सहने में अपने हृदय/ चित्त को लगा दिया है ।
सदासुखदासजी