जम्हा णिग्गंथो सो वादादवसीददंसमसयाणं ।
सहदि य विविधा बाधा तेण सदेहे अणादरदा॥1179॥
वायु धूप अरु दंश मशक आदिक के कष्ट सहें निर्ग्रन्थ ।
सहें विविध बाधा वे इससे नहीं देह में आदरवन्त॥1179॥
अन्वयार्थ : क्योंकि ये निर्ग्रन्थ मुनि, पवन, आताप, शीत, दंशमशकादि द्वारा की गई अनेक प्रकार की बाधाओं को सहते हैं । इस कारण इनने अपने देह से भी विषय की अनादरता अंगीकार की ।

  सदासुखदासजी