संगपरिमग्गणादी णिस्संगे णत्थि सव्वविक्खेवा ।
ज्झाणज्झेणाणि तओ तस्स अविग्घेण वच्चंति॥1180॥
निस्संगी को नहीं परिग्रह शोधादिक का कोई विकल्प ।
अतः ध्यान अरु अध्ययन उनके होते रहें सदा निर्विघ्न॥1180॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के त्यागी को नहीं होता और जब विक्षेप नहीं है तो निर्विघ्नता पूर्वक ध्यान तथा स्वाध्याय में निरन्तर प्रवृत्ति होती है । इसलिए सर्व तपों में प्रधान जो ध्यान, स्वाध्याय, उनमें प्रवर्तन करने का उपाय एकमात्र परिग्रह का त्याग ही है ।

  सदासुखदासजी