गंथच्चाएण पुणो भावविसुद्धी वि दीविदा होइ ।
ण हु संगघडिदबुद्धी संगे जहिदंु कुणदि बुद्धी॥1181॥
संग-त्याग से परिणामों की निर्मलता भी बने प्रदीप्त ।
क्योंकि संग-आसक्त बुद्धि की संग त्याग की नहीं मति॥1181॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के त्याग से ही भावों की विशुद्धि प्रकट होती है, परिग्रह में आसक्त बुद्धि वाला पुरुष, परिग्रह त्यागने की बुद्धि नहीं करता ।

  सदासुखदासजी