
णिस्संगो चेव सदा कसायसल्लेहणं कुणदि भिक्खू ।
संगा हु उदीरंति कसाए अग्गीव कट्ठाणि॥1182॥
परिग्रह रहित भिक्षु ही कर सकता कषाय का सल्लेखन ।
ज्यों लकड़ी से आग भड़कती त्यों कषाय परिग्रह से ही॥1182॥
अन्वयार्थ : परिग्रहरहित साधु ही सदा कषायों को कृश करता है । परिग्रह धारी के कषायों की तीव्रता ही होती है । जैसे काष्ठ अग्नि की वृद्धि करता है, तैसे ही परिग्रह कषायों को उत्कृष्ट/तीव्र ही करता है ।
सदासुखदासजी