
सव्वत्थ होइ लहुगो रूवं विस्सासियं हवदि तस्स ।
गुरुगो ही संगसत्तो संकिज्जइ चावि सव्वत्थ॥1183॥
वे सर्वत्र रहें निश्चिन्त रूप उत्पन्न करे विश्वास ।
संगी सदा संग से चिन्तित रहे सब जगह शंका-पात्र॥1183॥
अन्वयार्थ : परिग्रहरहित साधु के गमन में, आगमन में सर्वत्र भाररहित स्वाधीनता होती है तथा निर्ग्रन्थ रूप भी सभी को विश्वास करने योग्य होता है । परिग्रह में आसक्त जो साधु उन्हें बहुत भार रहता है और परिग्रह का धारक सर्व जगत में शंका करने योग्य होता है ।
सदासुखदासजी