
सव्वत्थ अप्पवसिओ णिस्संगो णिब्भओ य सव्वत्थ ।
होदि य णिप्परियम्मो णिप्पडिकम्मो य सव्वत्थ॥1184॥
निस्संगी सर्वत्र भय रहित और सब जगह हो स्वाधीन ।
काम नहीं करता कोई, यह किया, शेष यह, चिन्ताहीन॥1184॥
अन्वयार्थ : जो परिग्रहरहित साधु हैं, वे सभी ग्राम में, नगर में, वन में, स्वाधीन रहते हैं और सर्व अवसर में, सर्व स्थानों में निर्भय रहते हैं, सर्व काल में व्यापार रहित/प्रवृत्ति रहित होते हैं और यह कार्य मैंने किया तो है, परंतु यह कार्य मुझे और करना है - इत्यादि सर्व विकल्पों से रहित, परिग्रह का त्यागी ही होता है ।
सदासुखदासजी