भारक्कंतो पुरिसो भारं ऊरुहिय णिव्वुदो होइ ।
जह तह पयहिय गंथे णिस्संगो णिव्वुदो होइ॥1185॥
भाराक्रान्त पुरुष ज्यों बोझा तजकर होता सदा सुखी ।
त्यों परिग्रह तजकर निःसंग रहे वह मुनि ही सदा सुखी॥1185॥
अन्वयार्थ : जैसे भार से दबा हुआ पुरुष भार को उतारकर सुखी होता है, तैसे ही संगरहित साधु भी परिग्रह का भार उतारकर सुखी होता है ।

  सदासुखदासजी