जावंति केइ संगा विराधया तिविहकालसंभूदा ।
तेहिं तिविहेण विरदो विमुत्तसंगो जह सरीरं॥1187॥
अतः क्षपक! तीनों कालों का परिग्रह रत्नत्रय नाशक ।
मन-वच-तन से तजो, निसंगी बनो, करो फिर तन का त्याग॥1187॥
अन्वयार्थ : भो कल्याणार्थी! इस जीव को तीन काल में जितना संग/परिग्रह मिला, वह रत्नत्रय का विनाशक है, उनसे मन-वचन-काय से विरक्त होकर संग से रहित होकर शरीर को त्यागो ।

  सदासुखदासजी