एवं कदकरणिज्जो तिकालतिविहेण चेव सव्वत्थ ।
आसं तण्हं संगं छिंद ममत्तिं च मुच्छं च॥1188॥
इसप्रकार कृतकृत्य क्षपक तुम तीन काल के संग का त्याग ।
करो त्रिविध से आशा तृष्णा मूर्च्छा और ममत्व परित्याग॥1188॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार करने योग्य कर लिया है जिसने, ऐसे तुम तीनों काल में मन-वचन-काय से सर्व पर पदार्थ में आशा, तृष्णा, संग, ममत्व और मूर्च्छादि का त्याग करो ।

  सदासुखदासजी