पं-सदासुखदासजी
सव्वग्गंथविमुक्को सीदीभूदो पसण्णचित्तो य ।
जं पावइ पीयिसुहं ण चक्कवट्टी वि तं लहइ॥1189॥
सर्व संग-परित्यागी को जो सुख एवं प्रसन्नता हो ।
जैसा प्रीतिरूप सुख पाए चक्रवर्ति को भी न मिले॥1189॥
सदासुखदासजी