रागविवागसतण्णादिगिद्धि अवतित्ति चक्कवट्टिसुहं ।
णिस्संगणिव्वुइसुहस्स कहं अग्घइ अणंतभागं पि॥1190॥
चक्रवर्ति के सुख का फल है राग और तृष्णा बढ़ती ।
जो निसंग को सुख निवृत्ति का नृप को भाग अनन्त नहीं॥1190॥
अन्वयार्थ : इस जगत में जो पुरुष सर्वसंग रहित है और तृष्णा के आताप से रहित जिसका चित्त शीतल है । लोभ की मलिनतारहित जिसका उज्ज्वल चित्त है - ऐसा पुरुष जिस प्रीति और सुख को प्राप्त होता है, वैसे सुख और प्रीति को चक्रवर्ती भी प्राप्त नहीं होते; क्योंकि चक्रवर्ती का सुख तो राग/चारित्रमोह के उदय से उत्पन्न हुआ है । यदि तीव्र राग न हो तो महा बेखबर होकर अतिनिंद्य विषयों में कैसे रमता? और तृष्णासहित है, जिससे चाह की दाह नहीं मिटती है तथा अतिगृद्धता/अतिलंपटता से सहित है; क्योंकि भोगों में उलझे हुए को स्वयं नहीं सुलझा सकता है । इन भोगों को भोगते हुए भी तृप्ति नहीं होती । इसलिए पराधीनता रहित रागादि के आताप से रहित जो निस्संगों को निराकुलतारूप आत्मिक सुख है, उसके अनंतवें भाग भी चक्रवर्ती को सुख नहीं है ।

  सदासुखदासजी