
साधेंति जं महत्थं आयरिदाइं च जं महल्लेहिं ।
जं च महल्लाहं सयं महव्वदाहं हवे ताइं॥1191॥
क्योंकि महान प्रयोजन साधें महत् पुरुष से आचरणीय ।
स्वयं महान स्वरूप व्रतों को अतः महाव्रत कहें इन्हें॥1191॥
अन्वयार्थ : क्योंकि इन पंच पापों का त्याग, महान अर्थ/निर्वाण के अनन्त ज्ञानादि गुणों को सिद्ध करता है - इस कारण इनको महाव्रत कहते हैं । महान पुरुष तीर्थंकर, चक्रवर्ती, गणधरादिक इनका आचरण करते हैं, इसलिए भी इन्हें महाव्रत कहते हैं और ये पंचमहाव्रत स्वयं ही महान हैं, इससे भी ये महाव्रत हैं ।
सदासुखदासजी