तेसिं चेव वंदाणं रक्खट्ठं णदिभोयणणियत्ती ।
अठ्ठप्पवयणमादाओ भावणाओ य सव्वाओ॥1192॥
अतः व्रतों की रक्षा हेतु निशि-भोजन का त्याग कहा ।
और व्रतों की सर्व भावना तथा अष्ट प्रवचन माता॥1192॥
अन्वयार्थ : इन महाव्रतों की रक्षा के लिये रात्रिभोजन का त्याग, अष्ट प्रवचनमातृका को धारण करना तथा संपूर्ण भावनाओं की भावना करना श्रेष्ठ है । पंच समिति और तीन गुप्ति को अष्ट प्रवचनमातृका कहते हैं । आगे इन्हीं का वर्णन करेंगे तथा पाँच महाव्रतों की पच्चीस भावनायें भी इस ग्रन्थ में कहेंगे ।

  सदासुखदासजी