तेसिं पंचण्हं पि य अहयाणमावज्जणं व संका वा ।
आदविवत्ती य हवे णदीभत्तप्पसंगम्मि॥1193॥
निशिभोजन में पाँच पाप हों अहिंसादि सब व्रत का नाश ।
हिंसा की शंका नित रहती और अनेक विपति का वास॥1193॥
अन्वयार्थ : रात्रिभोजन का प्रसंग होने पर (करने से) पंचमहाव्रतों का तो नाश हो ही जाता है और व्रतभंग होने की शंका होती है तथा आत्मविपत्ति आ जाती है ।

  सदासुखदासजी